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समुद्र में उभर रहा युद्ध का तूफान!

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समुद्र में उभर रहा युद्ध का तूफान!

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war is eminent, not on Himalaya but in Indian ocean

हिमालय (Himalaya) पर तो सिर्फ जंग (war) के बादल हैं…लेकिन युद्ध का असली तूफान तो समुद्र में उभर रहा है। ज़रा बारीकी से देखें तो आने वाले वक्त में दुनिया के दो सबसे बड़े देशों का रणक्षेत्र ये झील नहीं, बल्कि समंदर होने जा रहा है। यूं समझ लीजिए थाईलैंड का आंगन…।

बैंकाक में एक संसदीय कमेटी इस महीने सिफारिश पेश करने वाली है कि क्या चीन की मदद से करा नहर बनाई जानी चाहिए..? आपकी ग़लती नहीं है अगर आपने करा नहर के बारे में पहले कभी नहीं सुना..। दक्षिण के कुछ प्राचीन राजवंशों को छोड़कर हम हिंदुस्तानी, सदियों से समुद्री सुरक्षा को लेकर अंधे, “सी-ब्लाइंड”, माने जाते रहे हैं..। इसलिए सबसे पहले ये सवाल कि करा नहर पर भारत में बात क्यों निहायत ज़रूरी है..?

ये समझने के लिए ज़रा नीचे दी गई तस्वीर में काली लकीर को ग़ौर से देखिए..। सिंगापुर से होती हुई मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच से जिस संकरे समुद्री क्षेत्र से ये रेखा गुज़र रही है, वो मलक्का जलसंधि है..। बात सिर्फ इतनी सी नहीं है कि चीन का 80 प्रतिशत तेल यहां से गुज़रता है..। अगर भारत को समुद्र के रास्ते घेरना हो…अफ्रीका, मध्य-पूर्व, भूमध्य सागर के इलाकों तक मदद पहुंचानी हो तो चीनी नौसेना के लिए मलक्का जलसंधि से गुज़रना ही इकलौता रास्ता है….लेकिन मलेशिया और इंडोनेशिया में से कोई भी पाकिस्तान नहीं है, उल्टे दोनों देशों के चीन से विवाद हैं…। लिहाज़ा मलक्का की जलसंधि पर एकछत्र दबदबा बनाना चीन के लिए मुमकिन नहीं है..।

अब इसी तस्वीर में लाल लकीर को देखिए..। अगर दक्षिणी थाईलैंड में थाईलैंड की खाड़ी के सोंगखला से लेकर अंडमान सागर में क्राबी तक नहर खोदी जाए तो चीन के लिए हिंद महासागर तक पहुंचने का दूसरा रास्ता खुल जाता है…। इससे चीनी जहाज़ों को 700 मील सफर कम तय करना होगा…और हर साल उसकी करोड़ों डॉलर की बचत होगी..। इसीलिए ये नहर चीन के दुनिया भर में फैले बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम का सबसे अहम हिस्सा मानी जा रही है..। चीन इस पर 30 बिलियन डॉलर तक खर्च करने को तैयार है..।

हालांकि आर्थिक जानकार हिसाब लगाते हैं कि इस नहर में इतना ज़्यादा निवेश खर्च ज़्यादा और आमदनी कम वाली बात हो सकती है..। लेकिन इससे चीन की दिलचस्पी प्रोजेक्ट में कम नहीं हुई है..। एक तो मलक्का जलसंधि से हर साल 80 हज़ार जहाज़ गुजरते हैं और इससे ज़्यादा ट्रैफिक उससे गुज़र नहीं सकता..। लिहाज़ा कुछ सालों बाद उसका विकल्प ज़रूरी होगा..। दूसरा, चीन के लिए ये मसला महज़ कारोबार से बढ़कर है..। भारत के संदर्भ में बात करें तो “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” की चीनी रणनीति को ये नहर मुकम्मल करती है..।

चीनी नौसेना एक ओर बंगाल की खाड़ी में पैर पसार रही है, तो दूसरी ओर पूर्वी अफ्रीका के जिबूती में उसने ठिकाना बना लिया है…। म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान, ईरान और रूस की नौसेनाओं के साथ लाल नौसेना के युद्धाभ्यास (war practice) चलते हैं..। नक्शे पर नज़र दौड़ाएंगे तो भारत के चारों ओर चीन की पकड़ वाले बंदरगाह नज़र आएंगे..। करा नहर का जवाब देने के लिए भारत के पास सिर्फ एक रणनीतिक रास्ता है..। अंडमान और निकोबार के सुरक्षा कवच को और मज़बूत करे..। इस दिशा में काम तो हुआ है लेकिन भारतीय सिस्टम की उसी सुस्त गति से..।

अब तक थाईलैंड इस परियोजना पर हामी से बचता रहा था…। बैंकाक को मालूम है इससे उसका खज़ाना ज़रूर भरेगा, लेकिन देश भू-रणनीतिक विवाद के केंद्र में भी आ जाएगा..। सिर्फ इतना ही नहीं, थाईलैंड के दक्षिण में मुस्लिम बहुल आबादी वाले मलय इलाके हैं, जहां पहले से सशस्त्र विद्रोह चल रहे हैं..। ये नहर उन इलाकों और देश के उत्तरी बौद्ध इलाकों के बीच मनोवैज्ञानिक सीमा बनकर खड़ी हो सकती है…। इसी विरोध को ख़त्म करने के लिए चीन ने वहां के जनमत पर कई साल काम किया है..। कुछ कसर साल 2014 में भी पूरी हो गई जब वहीं की सेना के तख़्तापलट को अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने मंज़ूर नहीं किया..। इसके बाद थाईलैंड की सरकार चीन के और करीब हो गई..।

पेगोंग सो झील, तिब्बत

लेकिन ऐसा क्यों है कि आने वाले वक्त में हिमालय (Himalaya) के बजाए इस इलाके के रणक्षेत्र होने के आसार ज़्यादा हैं..? 20वीं सदी की शुरुआत में पनामा नहर बनी तो अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा के लिए पनामा को कोलंबिया से अलग करवाने के लिए नौसेना भेजी…। आज तक पनामा में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी है…। इससे भी पहले 1869 में स्वेज नहर बनी थी..। लगभग 100 साल बाद यानी 1956 तक भी इस पर ब्रितानी और फ्रांसीसी खून बहा रहे थे…। 1975 तक ये नहर सियासी फुटबॉल बनी रही..।

थाईलैंड के कर्णधारों को याद रखना चाहिए कि स्वेज नहर के दूसरी ओर सिनाई प्रायद्वीप में मिस्त्र को आज भी इस्लामी दहशतगर्दी का सामना करना पड़ रहा है..। ये कल्पना से परे नहीं है कि चीन भी थाईलैंड के दक्षिणी हिस्सों में हिंसक आंदोलनों को हवा देकर करा नहर पर अपनी पकड़ पक्की कर ले..और 100 साल बाद हम उसका उदाहरण इसी तरह तरह दे रहे हों….जैसे आज अमेरिका नौसेना की पनामा में मौजूदगी का दे रहे हैं..।

साभार: अवर्ण दीपक, युवा पत्रकार एवं लेखक

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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