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आखिर क्या चाहता है चीन?

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आखिर क्या चाहता है चीन?

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कभी-कभी किसी राजनीतिक चाल का समय वो नहीं होता, जब आप सबसे ज्यादा ताकतवर हों, बल्कि वो होता है, जब आपके दुश्मन सबसे ज्यादा कमजोर हों। शायद चीन के सत्तासीन नेताओं की सोच यही है। जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझने में व्यस्त हो, सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा गई हों और ज्यादातर देश अपने घर को संभालने में व्यस्त हों, ऐसे समय में चीन का एक साथ भारत, हांगकांग, ताइवान और अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोलना , इसी रणनीतिक पहल की ओर इशारा करता है।

क्या है विवाद?

शी चिनपिंग के शासनकाल में चीन ने हमेशा अपनी सीमाओं, क्षेत्रीयता और संप्रभुता के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। कोरोना के संक्रमण के बाद एकबारगी चीन ठिठक गया था, लेकिन जैसे ही उनके यहां स्थिति संभली, उन्होंने इसे एक अवसर के रुप में देखना शुरु कर दिया। इस आपदा से सबसे पहले बाहर निकलते ही चीन ने दुनिया का सुपरपावर बनने के अपने सपने को साकार करने की कोशिशें शुरु कर दीं। वैसे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की काफी किरकिरी हो चुकी है। दुनिया भर में कोरोना वायरस के प्रसार के लिए, अमेरिका समेत तमाम देश चीन को ही जिम्मेदार ठहराते आये हैं। वहीं, इस मामले में ताइवान और भारत द्वारा उठाये गये कदमों की दुनिया भऱ में प्रशंसा हुई है। ऐसे में चीन के लिए अपनी नाराजगी और शक्ति का अहसास कराना जरुरी हो गया था।

वहीं भारत के लिए भी सीमा का मामला उसकी संप्रभुता और सम्मान से जुड़ा है। सालों की अनदेखी के बाद मोदी सरकार ने सीमा पर कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए कई प्रयास किये हैं और साल 2022 तक चीनी से सटे इलाकों में 66 अहम सड़कें बनाने का लक्ष्य है। ऐसी ही एक सड़क है गलवान घाटी के पास, जो दौलतबेग ओल्डी एयर बेस को जोड़ती है। इसका उद्घाटन पिछले साल अक्तूबर में किया गया था। ये सड़क काफी अहम है क्योंकि ये सीमा के समानांतर चलती है और मुख्य सप्लाई बेस को जोड़ती है। इस बात को लेकर पिछले दो साल में पैंगोंग त्सो और गलवान इलाके में भारतीय सेना और पीएलए के बीच कई बार टकराव हुआ है। लेकिन इस बार चीन ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है। फिलहाल टकराव वाले तीन स्थान गलवान घाटी में हैं और चौथा पैंगोंग झील के पास। चीन यहां भारत के बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण कार्य और विशेषकर गलवान नाले पर 60 मीटर लंबे पुल और पैंगोंग झील के पास एक निगरानी पोस्ट के निर्माण पर रोक लगाना चाहता है। 

क्या है मौजूदा स्थिति?

  • चीन ने सीमा विवाद को लेकर अपने सुर नरम जरूर किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनके रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। लद्दाख सेक्टर में गलवान घाटी से पैंगोंग त्सो झील तक चार जगहों पर भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने डटे हुए हैं। ना तो सैनिकों की संख्या में कोई कमी आई है और ना ही तनाव में।
  • पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच गतिरोध के बीच चीनी राजदूत ने बुधवार को कहा कि दोनों देशों को अपने मतभेदों का असर कभी भी समग्र द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं पड़ने देना चाहिए और आपसी विश्वास को बढ़ाया जाना चाहिए। 
  • चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आधिकारिक तौर पर कहा कि भारत के साथ सीमा पर स्थिति ‘कुल मिलाकर स्थिर और नियंत्रण में है’ और दोनों देशों के पास बातचीत और परामर्श के माध्यम से मुद्दों को हल करने के लिए उचित तंत्र और संचार माध्यम हैं।
  • इससे पहले तनाव बढ़ता देख अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट कर मामले की मध्‍यस्‍थता की पेशकश की। जिसके बाद चीन ने इसका विरोध करते हुए कहा कि दोनों देशों को अपने मतभेद आपसी बातचीत के जरिये सुलझाने चाहिए ।
  • सीमा पर दो हफ्तों ले जारी गतिरोध के बीच, मंगलवार को चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने संसद सत्र के दौरान पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और पीपुल्स आर्म्ड पुलिस फोर्स के प्रतिनिधियों की पूर्ण बैठक में हिस्सा लेते हुए गंभीर  टिप्प्णी की। शी ने सेना को आदेश दिया कि वह सबसे खराब स्थिति की कल्पना करे, उसके बारे में सोचे और युद्ध के लिए अपनी तैयारियों और प्रशिक्षण को बढ़ाए।

क्या है चीन की रणनीति ?

  • चीन लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) सेक्टर में भारत के बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण को रोकना चाहता है, क्योंकि इससे अक्साई चिन के लहासा-काशगर हाईवे को खतरा पैदा हो सकता है।
  • पीएलए ने यहां पर दो ब्रिगेड को तैनात किया है। इससे संकेत मिलता है कि इस कदम पर बिजिंग ने मुहर लगाई है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जुड़े सूत्रों के मुताबिक डरबोक-श्योक-डीबीओ रोड इस साल पूरा हो जाएगा और इससे इलाके में भारतीय सेना की तेजी से तैनाती की क्षमता बढ़ जाएगी। यदि इस रोड प्रॉजेक्ट को ब्लॉक कर दिया जाए, तो भारतीय सेना को सैनिक साजो-सामान की आपूर्ति के लिए दूसरे कठिन मार्गों का इस्तेमाल करना होगा।
  • चीन का मकसद बॉर्डर पर भीरतीय इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास से रोकना है। यह गर्मी इसके लिए आखिरी मौका है, क्योंकि जैसे ही ठंड शुरु हो जाएगी, निर्माण कार्य मुश्किल हो जाएगा।
  • भारत के एक पूर्व सेना अध्यक्ष के मुताबिक चीन ने हमेशा अपने दावे वाले क्षेत्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया, और चीनी क्षेत्र में सभी मिलिट्री आउटपोस्ट पक्की सड़कों से जुड़े हुए हैं। लेकिन जब इसी तरह का काम भारतीय क्षेत्र में शुरु हुआ, तो वह विरोध पर उतर आया है।

चीन की नाराजगी की और भी हैं वजहें?

  • चीन को व्यापारिक मोर्चे पर झटका लग रहा है। चीन से विदेशी कंपनियां हटना चाहती हैं। मौजूदा समय में चीन ने खुद को सप्लाई चेन के केंद्र के तौर पर स्थापित कर रखा है। लेकिन कोविड-19 के बाद पूरी दुनिया के देश और कारोबारी, इस मामले में चीन पर भरोसा करने से कतरा रहे हैं।
  • विशेषज्ञों के मुताबिक इस महामारी ने, राष्ट्रों को एक ही देश पर इतनी ज्यादा निर्भरता के बारे में फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है। इसी वजह से  कई कंपनियां अपना बेस चीन से दूसरे देशों में शिफ्ट करने पर विचार कर रही हैं।
  • आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक भारत भले ही कई मायनों में चीन से पीछे है, लेकिन यहां की विशाल जनसंख्या और बड़ा बाजार कंपनियों को यहां अपनी फैक्ट्री लागने के लिए आकर्षित कर रहा है। कोरोना की वजह से मंदी की चपेट में आई कंपनियों को ऐसे बाजार की तलाश है, जहां मांग बहुत हो। और भारत एक मजबूत दावेदार के तौर पर उभरा है।
  • कूटनीतिक स्तर पर ताइवान और हांगकांग में फंसा चीन, भारत से ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर ठोस आश्वासन चाहता है। ताइवान के मुद्दे पर अमेरिकी रुख को भारत का परोक्ष समर्थन चीन को नागवार लगा है। वहीं बीजेपी दो सांसदों के ताइवान राष्ट्रपति के शपथ समारोह में शामिल होने पर भी चीन ने आपत्ति जताई थी।
  • कोविड संकट में सार्थक भूमिका की वजह से ताइवान को काफी समर्थन मिला है, जबकि चीन को दुनिया संदेह की नजर से देख रही है। भारत की भूमिका भी संकट के वक्त बढ़ी है।
  • अमेरिका और भारत की रणनीतिक साझेदारी भी स्पष्ट नजर आई है। इन सबसे चीनी शासन में झुंझलाहट है। सूत्रों के मुताबिक कई मोर्चो पर उलझा चीन अपने खिलाफ बने माहौल से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है।
  • चीन ने 1962 के बाद से इस इलाके में कभी भी इस तरह का आक्रामक रुख नहीं दिखाया। इसलिए माना जा रहा है कि चीन जानबूझकर दबाव बनाने के लिए इस तरह का कदम उठा रहा है, जिससे वह व्यापारिक मोर्चे पर भारत पर दबाव बना सके।

क्या है भारत का स्टैंड?

  • सरकारी सूत्रों के मुताबिक व्यापार, कूटनीति और सैन्य आक्रामकता, किसी भी मोर्चे पर भारत चीन से नहीं झुकेगा। चीन को हर मोर्चे पर उसी की भाषा में जवाब देने की तैयारी की गई है। काराकोरम दर्रा और अन्य क्षेत्रों में भारत ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है।
  • भारत ने पूर्वी लद्दाख के तनाव वाले इलाके में चीन के साथ गतिरोध से अब पीछे न होने का फैसला कर लिया है। भारत अपने रुख से हिल नहीं सकता है, क्योंकि इससे चीन की सैन्य ताकत से विस्तारवादी सोच को बल मिलेगा। 
  •  सूत्रों की मानें तो भारत ने यह फैसला भारतीय क्षेत्र में किसी भी तरह की चीनी घुसपैठ और भारतीय इलाके में स्थिति परिवर्तन की कोशिशों को नाकाम करने के उद्देश्य से लिया है।
  • भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक चीन ऑस्ट्रेलिया से हांगकांग तक, ताइवान से साउथ चाइना सी तक और भारत से अमेरिका तक, हर कीमत पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है।
  • चीन ने मानसिक दबाव बनाने की शुरुआत कर दी है। इसके मुखपत्र ने भारत को 1962 युद्ध की याद दिलाई है, लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ और हैं और इस बार देश का प्रधानमंत्री कोई और।

क्या युद्ध करेगा चीन?

इस बात की संभावना कम ही है कि चीन इस मुद्दे को लेकर युद्ध शुरु कर दे। इसकी वजह ये नहीं कि चीन को भारत से किसी तरह का भय है, असली वजह ये है कि दो बड़े देशों के बीच का युद्ध, आर्थिक, सामरिक दृष्टि से दोनों देशों के लिए नुकसानदेह साबित होगा। भारत में चीन की कई कंपनियां व्यवसाय कर रही हैं और आयात-निर्यात का संतुलन चीन के पक्ष में है। फिलहाल चीन की अपनी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। चीन ने ऐलान किया है कि इस बार देश के विकास-दर का कोई लक्ष्य घोषित नहीं किया जाएगा। ये अप्रत्याशित है क्योंकि 1990 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है। जाहिर है सरकार को अर्थव्यवस्था के शीघ्र पटरी पर आने की गुंजाइश नहीं दिख रही। लॉकडाउन के बाद देश में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं, लेकिन अभी भी क्षमता का सिर्फ 30 फीसदी उत्पादन हो रहा है। यहां मार्च-अप्रैल में बेरोजगारी की दर 6 फीसदी से ज्यादा थी, जिसे ऐतिहासिक कहा जा रहा है। वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि असली स्थिति इससे भी बुरी होगी। चीन के लोगों ने कोरोना की दूसरी लहर का भी अंदेशा है, इसलिए शहरी क्षेत्रों के अपने गांवों की ओर गये मजदूर वापस नहीं लौटे हैं। चीनी एजेंसी ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक, देश के करीब 85 फीसदी प्राइवेट कंपनियां अगले तीन महीनों तक अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए जूझती रहेंगी। ऐसे में, बचे रहने के लिए सैलरी और नौकरी में कटौती जैसे कदम भी उठाने पड़ेंगे।

भारत-चीन विवाद में जो मौजूदा स्थिति दिख रही है उसके मुताबिक चीन के दो लक्ष्य हो सकते हैं। पहला, भारत को कुछ महीनों तक सीमा पर कंस्ट्रक्शन का काम करने से रोके रखना ताकि सर्दियां शुरु हो जाएं, और उसका मकसद पूरा जाए। दूसरा, भारत को युद्ध के संकट में उलझाए रखना ताकि आर्थिक मोर्चे पर वो ज्यादा ध्यान नहीं दे सके और विदेश कंपनियां भी युद्ध की आशंका को देखते हुए निवेश या शिफ्टिंग से दूर रहें। अगर दुनिया में ये संदेश जाए कि भारत युद्ध के कगार पर खड़ा है, तो निश्चित तौर पर निवेशक अपनी कंपनी भारत में शिफ्ट करने के बजाए, कुछ महीनों तक चीन में ही टिके रहने की सोचेंगे। चीन को अपनी इकोनॉमी को पटरी पर लाने के लिए कुछ ही महीनों की जरुरत है। वहीं कुछ ही महीनों में ये भी साफ हो जाएगा कि कोरोना ने अमेरिका को कितनी क्षति पहुंचाई और वो सुपरपावर की पोजिशन बनाये रख पाएगा या नहीं।

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