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चाहता क्या है चीन?

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चाहता क्या है चीन?

Anantnag
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लद्दाख में चीन की सरहद पर क्या हुआ है..इसका ठीक-ठीक ब्योरा पता लगने में शायद दिन लगें..या महीनों भी..। लेकिन ग्लोबल टाइम्स के मुख्य संपादक ने ट्वीट में माना है कि हताहत चीन के सैनिक भी हुए हैं..। इतना तो दोनों पक्ष मान चुके हैं कि हिंसा तो हुई, लेकिन गोलीबारी नहीं..। क्या दौर देख रहे हैं हम..! एशिया और दुनिया की इतनी बड़ी ताकतों के फौजी मध्ययुग की सेनाओं के तरीकों से एक दूसरे की जान ले रहे हैं..! टीवी जोकरों के तमाशों और बदले-बहिष्कार के व्हाट्स-ऐप ज्ञान से बचे हों तो कुछ मिथकों के पार देखने की कोशिश करें, जिनके शिकार बाएं और दाएं दोनों पक्ष के लोग हैं।

बाईं ओर का मिथक – 1

चीन भारत से इसलिए नाराज़ है क्योंकि मोदी सरकार ने ट्रंप के अमेरिका के साथ रणनीतिक पर्देदारी हटा दी है..। अगर यही बात है तो फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रेगो दुतेर्तो कुर्सी संभालने के बाद से ही चीन के पाले में जाने को बेताब थे..। इस साल फरवरी में उन्होंने वो समझौता भी स्थगित करने का ऐलान कर दिया, जिसके बूते अमेरिकी सैनिक वहां मौजूद थे..। बदले में उन्हें क्या मिला? आपको कुछ सुना-सुना सा लगेगा..लेकिन दो-तीन हफ़्ते पहले ही चीन ने नया नक्शा जारी किया और दक्षिणी चीन सागर में फिलीपींस के कई द्वीपों को अपना हिस्सा बता दिया..। इसी महीने फिलीपींस के राष्ट्रपति ने अमेरिका से समझौता रद्द करने का फैसला टाल दिया..। अभी 10 तारीख़ को ही वहां के रक्षामंत्री ऐसे ही एक विवादित द्वीप थिटू जाकर आए हैं..वहां अपना हक जतलाने..।

दाईं ओर का मिथक – 2

ये तो मौजूदा सरकार है जो चीन को इतने में ही संभाले हुए है, कोई और पीएम होता तो बीजिंग की धौंस और ज़्यादा होती..। लेकिन सच तो ये है कि अगर मोदी जी ने किसी नेता को सबसे ज़्यादा सहलाया है, तो वो जिनपिंग ही हैं..। झूला झुलाने और चाय पिलाने के सीन याद हैं ना आपको..? लेकिन जब आप बतौर मुल्क अपना ध्यान ताकतवर बनने के बजाए झगड़ों, सियासतों, झूठ और फ़रेब में लगाएंगे तो आपका प्रतिद्वंद्वी मूर्ख ही होगा, अगर फायदा ना उठाए..। आपने कहा डोकलाम..? जानकार मानते हैं चीन वहां से इसलिए हटा क्योंकि इलाके के हिसाब से कमज़ोर रणनीतिक स्थिति में था..।

बाईं ओर का मिथक – 3

सीमा की समझ को लेकर दोनों देशों में वाकई मतभेद हैं और ऐसे विवाद इन्हीं मतभेदों का नतीजा हैं..। सही बात है, मतभेद हैं..। लेकिन पिछले 45 साल में आज तक किसी की जान इन मतभेदों ने नहीं ली थी..। इंडोनेशिया से तो चीन की कोई सीमा भी नहीं लगती..। दक्षिणी चीन सागर में हाल ही में चीन ने ऐसे नटूना द्वीप पर दावा जताया है, जो उसकी मुख्य भूमि से 1500 किलोमीटर दूर है..। दो हफ़्ते पहले ही इंडोनेशिया इस मसले को यूएन लेकर गया है, हाल ही में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति भी उस द्वीप पर होकर आए हैं..। और इंडोनेशिया तो अमेरिका का पिछलग्गू भी वैसा नहीं रहा है..।

दाईं ओर का मिथक – 4

चीनी सामान के बहिष्कार से उसे नुकसान पहुंचाया जा सकता है..। बिल्कुल बेजा बात है..। आर्थिक तौर पर चीन को जितनी भारत की ज़रूरत है, उससे ज़्यादा भारत को चीन की है..। कुछ साल पहले इस पर एक विस्तृत कहानी कर चुका हूं..। एक बार फिर आपने सिर्फ लोगों को छलने से काम चलाया और देश में निर्माण की शक्ति पैदा ही नहीं की तो अब तल्ख़ हकीकत से तो टकराएंगे ही..। ज़्यादा से ज़्यादा आप कुछ बड़ी चीनी कंपनियों के लिए निवेश मुश्किल बना सकते हैं, लेकिन ड्रैगन पर स्वदेशी का डंडा काम नहीं करेगा..।

दाईं ओर का मिथक – 5

चीन को आंख दिखाओ तो वो डर जाता है..। अगर आप सुधीर चौधरी को रणनीतिक जानकार का दर्जा देते हैं, तभी इस सुझाव को संजीदगी से ले सकते हैं..। इतना ही याद दिलाऊंगा कि 1962 की जंग भी इस मुग़ालते से पैदा हुई फॉरवर्ड पॉलिसी का नतीजा थी..। तो फिर चीन ये हरकत क्यों कर रहा है..? आपको क्या लगता है आपदा को अवसर में बदलने का जीनियस फॉर्मूला सिर्फ मोदी जी के पास ही हो सकता है..? चीन खुद कोरोनावायरस से लगभग उबर चुका है और उसके सभी प्रतिद्वंद्वी अब भी बुरी तरह इस मुसीबत में फंसे हैं..। ऐसे में रणनीतिक बुद्धि कहती है कि दुश्मन की मजबूरी का फायदा उठाओ..। ताइवान में उसकी पिट्ठू राष्ट्पति नहीं बनी तो उसने वहां धौंस जमाई..। हॉन्गकॉन्ग में ठीक वैसा ही कानून लाया गया, जो वहां के लोग नहीं चाहते..। फिलीपींस, इंडोनेशिया और लद्दाख भी मुझे मौका देखकर चौका मारने के उदाहरण ही लगते हैं..।

क्या चाहता है चीन?

  • तमाम कूटनीतिक तहज़ीब और जुमलों में ढका दुनिया के कबीले का एक ही कानून है- जिसकी लाठी उसकी भैंस..। दोनों देशों की ताकत में कितना अंतर है, ये आप गूगल कर सकते हैं, लेकिन इतना जानना काफी है कि फिलहाल चीन का जीडीपी लगभग 14 ट्रिलियन डॉलर है और भारत का 3 ट्रिलियन से भी कम..। चीन को लगता है कि अब अपने बाकी सभी पड़ोसियों के मुकाबले उसकी ताकत इतनी बढ़ गई है कि उसकी मनमानी को कोई रोक नहीं सकता है..।
  • चीन की मौजूदा सत्ता खुद को माओ के बाद सबसे महान ख़ाके में देखती है..जो चीन को उसका पुराना गौरव लौटाएगी..। राष्ट्रवाद के रोग के यही लक्षण होते हैं जब देश के हाथ ताकत लग जाए..। कभी चीन की मीडिया और सोशल मीडिया में झांककर देखिएगा, आप हैरान होंगे हमारे भक्तों से उनकी वाणी और सुर किस कदर मिलते हैं…। फर्क सिर्फ इतना है कि हमें विश्व-गुरू बनना है, उन्हें विश्व-दरोगा…।

तो हमारे पास क्या हैं विकल्प?

  • जिस हालत में हम अभी हैं, चाणक्य नीति तो चीन के साथ मान-मनौव्वल करके रहने की ही सीख देती है..। लेकिन भारत के आकार और महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए वो आपको अपने पाले में रखेंगे या नहीं, ये मसला-दर-मसला तय होगा..। उसके पास आपको बांधकर रखने के लिए पाकिस्तान भी है..।
  • रणनीतिकार मानते हैं कि किसी देश को हमला करके रोकने के लिए उससे जीतने की ताकत ज़रूरी नहीं है..। अगर आप उसे ठीकठाक नुकसान पहुंचाने या पूरी तरह से जीत का परचम फहराने से रोकना का दम भी रखते हों, तो आप बचे रह जाएंगे..। इसीलिए तो पाकिस्तान को हम सिर्फ सबक सिखाने की बात भर करके रह जाते हैं..वो सबक आज तक देखा किसी ने..? इतना तो हम कर ही सकते हैं कि चीन के साथ ताकत का फर्क इतना भी ना बढ़ जाए कि उसे हमसे किसी तरह के नुकसान का खौफ़ ही ना रहे..।
  • समझदारी इस बात में है कि एशिया और दूसरे महाद्वीपों में जो देश चीन के खेमे में नहीं हैं, उनसे साझेदारियां बढ़ाएं..। जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम उदाहरण हैं..। हालांकि ये एक पतली धार पर चलने जैसा होगा और काफी कूटनीतिक सयानेपन की ज़रूरत होगी..।

अंत में अमेरिका का पत्ता भी हमारे पास है..। लेकिन वो कितना कारगर होगा, ये आने वाले अमेरिकी चुनाव के नतीजों के बाद ही कहना मुमकिन होगा..।

(युवा लेखक एवं पत्रकार अवर्ण दीपक की फेसबुक वॉल से साभार)

Shailendra

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