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सचिन पायलट : छक्का लगा.. या आउट?

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सचिन पायलट : छक्का लगा.. या आउट?

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Can Sachin pilot change the government in Rajasthan?

राजस्थान की राजनीति में आये भूचाल के बीच कांग्रेस ने कड़ा फैसला लिया है। तीन दिनों तक मनाने की कोशिशों के बाद आखिरकार कांग्रेस ने सचिन पायलट को बाहर का रास्ता दिखा दिया। सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री पद और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया है। विधायक दल की बैठक में सचिन पायलट, विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीणा को मंत्रिपद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया। बैठक में शामिल नहीं हुए विधायकों को भी नोटिस जारी किया जाएगा और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। पार्टी ने सचिन पायलट की जगह राजस्थान सरकार में वर्तमान शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को राजस्थान कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।

कांग्रेस विधायक दल की बैठक

क्यों नाराज थे सचिन?

  • राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) ने शुक्रवार की शाम उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को एक नोटिस भेजा। यह नोटिस सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गया।
  • आपको बता दें कि पुलिस विभाग… मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अंडर में ही है। उनके अलावा और कुछ अन्य निर्दलीय विधायकों को भी एसओजी का नोटिस गया है।
  • ये मामला एक फोन टैपिंग से जुड़ा है जिसमें दो बीजेपी नेताओं की बातचीत रिकॉर्ड की गई है। बातचीत में कथित तौर पर कहा गया कि ‘सीएम और डिप्टी सीएम लड़ रहे हैं और डिप्टी सीएम ही सीएम बनना चाहते हैं।’ एसओजी ने इस मामले में दो बीजेपी नेताओं को गिरफ्तार किया है।
  • सचिन पायलट पर राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने का भी दबाव बनाया जा रहा था। उनके किसी करीबी को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी नहीं मिल रही थी।
  • इस दोनों के बीच विवाद उसी समय से शुरु हो गया था, जब 2018 के विधानसभा चुनाव में बतौर प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में पार्टी ने जीत हासिल की…लेकिन मुख्यमंत्री बन गये अशोक गहलोत।उसके बाद से इन दोनों के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हुए।
  • मुख्यमंत्री गहलोत ने आईएएस-आईपीएस अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी पायलट के सुझावों को तवज्जो नहीं दी। उनके समर्थक का कहना है कि अधिकारी तो दूर, उन्हें अपनी पसंद का बीडीओ तक नहीं मिला।
  • सचिन बार-बार ये मुद्दा उठाते रहे कि गहलोत और उनके बीच मतभेद मिटाने के लिए बनी समन्वय समिति की बैठकें टाली जा रही हैं। यह समिति कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बनाई थी।
  • सूत्रों के मुताबिक सचिन पायलट ने शीर्ष नेतृत्व के समक्ष चार शर्तें रखी थीं। इनमें कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष का पद बरकरार रखने के अलावा गृह और वित्त विभाग दिए जाने की मांग भी शामिल है।
सीएम अशोक गहलोत के साथ सचिन पायलट

क्या सचिन को नहीं मिली तवज्जो?

पायलट को दी गई राजनीतिक तवज्जो के बारे में सुरजेवाला का कहना था कि “जो ताक़त, जो सम्मान, जो स्थान सचिन पायलट को मिला है वह शायद किसी को नहीं मिला। 26 की उम्र में सांसद, 32 में मंत्री और 34 की उम्र में प्रदेश अध्यक्ष और अब 40 की उम्र में उप-मुख्यमंत्री, 17-18 साल के अंतराल में इतनी तरक्की का मतलब है कि पार्टी ने उन्हें पूरा सम्मान दिया है।”

लेकिन बात इतनी सी नहीं है। हो सकता है, ज्योतिरादित्य या सचिन पायलट महत्वाकांक्षी हो गये हों….अपनी क्षमता और जनता पर पकड़ के मामले में खुद को ज्यादा आंक रहे हों। लेकिन, अगर किसी नये और युवा राजनीतिज्ञ को आगे आने दिया जाए और उसे नेतृत्व संभालने का मौका दिया जाए, तो इसमें हर्ज ही क्या है? कांग्रेस में बूढ़े घोड़ों पर दांव खेलने का इतिहास बहुत पुराना है, और उन्हें अक्सर इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि कमलनाथ और अशोक गहलोत जैसे अनुभवी लोगों को मुख्यमंत्री पद के बजाए… पार्टी को संभालने और उसका आधार मजबूत करने की जिम्मेदारी नहीं दी गई?

अब क्या करेंगे सचिन?

वैसे सचिन पायलट ने अब तक यही कहा है कि वे भाजपा में शामिल नहीं हो रहे हैं। लेकिन पार्टी से निकाले जाने के बाद उनके स्टैंड में परिवर्तन हो सकता है। हालांकि, राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक सचिन पायलट, बीजेपी के नेता जफर इस्लाम के संपर्क में हैं। जफर इस्लाम वही शख्स हैं, जिन्हें मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा में लाने का श्रेय दिया जाता है।

वैसे, बीजेपी को तब तक फायदा नहीं है, जब तक सचिन… सरकार बनाने लायक विधायक ना तोड़ लें। इसमें कुछ दिनों से लेकर कई महीने लग सकते हैं। वैसे चर्चा ये भी है कि वे नई पार्टी की घोषणा कर सकते हैं। इस तरह प्रदेश में तीसरे मोर्चे का गठन भी हो सकता है।

क्या विपक्ष का है ये सारा खेल?

बीजेपी प्रत्यक्ष नहीं, तो परोक्ष रुप से ही सही….इस खेल को हवा जरुर दे रही है। बीजेपी नेता ओम माथुर ने साफ कहा कि सचिन पायलट के लिए पार्टी के द्वार खुले हैं। कुछ अन्य घटनाएं भी हैं, जो इस ओर इशारा करती हैं।

  • विधायक दल की बैठक खत्म होने पर कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपा ने एक षडयंत्र के तहत कांग्रेस की सरकार को अस्थिर कर गिराने की कोशिश की है।  
  • इस विवाद की शुरुआत ही मुख्यमंत्री गहलोत के उस आरोप से हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि बीजेपी उनकी सरकार को अस्थिर करने की साजिश रच रही है। इसके लिए प्रत्येक विधायक को 20-25 करोड़ रुपए का लालच दिया जा रहा है।
  • सोमवार को कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष राजीव अरोड़ा और कांग्रेस नेता धर्मेंद्र राठौड़ के यहां इनकम टैक्स के छापे मारे गए। राजस्थान, दिल्ली और महाराष्ट्र में इन दोनों नेताओं के 24 ठिकानों पर कार्रवाई की गई।
  • ये दोनों नेता मुख्यमंत्री गहलोत के बेहद करीबी हैं। वे पार्टी का चुनाव प्रबंधन और फंडिग का काम देखते हैं।
  • ईडी ने भी जयपुर के पास कूकस स्थित होटल फेयर माउंट में छापा मारा। यह होटल अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत के करीबी का है।
  • आरोप है कि बीजेपी कांग्रेस के विधायकों को डरा-धमकाकर अपने खेमे में लाना चाहती है।

किसको फायदा, किसका नुकसान?

तमाम जोड़-घटाव के बाद इतना तो साफ है कि बीजेपी सरकार नहीं बना सकती। इसलिए उसने अभी तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। लेकिन ये भी तय है कि सरकार गिराने की कवायद जारी रहेगी।

इसमें फायदा किसका होगा? जब मुख्यमंत्री खुद विधायकों का रेट 20-25 करोड़ बता रहे हैं, तो अपने बागी विधायकों को वापस लाने के लिए इतनी कीमत तो चुकानी पड़ेगी। वहीं विधायकों के निष्कासन या इस्तीफे की स्थिति में उन्हें निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेना होगा। ऐसा ही ऑफर उन्हें बीजेपी से भी मिल रहा होगा। यानी इस्तीफा दें या सरकार के साथ रहें, ऐसे विधायकों की चांदी होनेवाली है। यूं समझिये कि, खरीद-फरोख्त के राजनीतिक बाजार में उनका भाव अचानक करोड़ों में पहुंच गया है और पद मिलने की संभावना अलग से।

नुकसान किसका है? सत्ता जाए, तो सत्तारुढ़ पार्टी का नुकसान है। अगर कुर्सी बच गई, तो भी इस झमेले से निकलने के लिए जेब ढीली करनी पड़ेगी। जेब ढीली हुई, तो कमाई के रास्ते निकालने पड़ेंगे और इन्हीं पांच सालों में अगले चुनाव का खर्च भी निकालना होगा। नुकसान जनता का है, जिसे कांग्रेस समझ कर वोट दिया, वो कांग्रेसी रहा ही नहीं। अगर इस्तीफा भी दिया, तो वोट बेकार गया। वहीं, सरकार का ध्यान अब जनहित के बजाए सत्ता बचाने पर लगा रहेगा। कमाई के नये तरीकों से होनेवाली वसूली भी तो आखिरकार जनता के पैसे से ही होगी।

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