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बड़े बेआबरु होकर…!

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बड़े बेआबरु होकर…!

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What will happen to Nitesh after defeat?

बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Elections 2020) में अब सभी को नतीजों का इंतज़ार है, लेकिन एक्जिट पोल के आंकड़े सामने आने के बाद से ही राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं। चुनाव से पहले तेजस्वी के निशाने पर रहे नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अब अपने सहयोगी बीजेपी के निशाने पर हैं। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी के कई नेता, जो इनकी कार्यशैली से खुश नहीं थे, अब इन्हें बिहार की राजनीति से बाहर करने की कोशिश में जुट गये हैं।

नीतीश (Nitish Kumar) को किनारे लगाने की कोशिश?

हाल ही में एग्जिट पोल के बाद केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे ने एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि मेरी व्यक्तिगत राय है कि चुने हुए नेताओं में से ही किसी एक को मुख्यमंत्री बनना चाहिए, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो। साथ ही नीतीश कुमार केंद्र में भी जा सकते हैं। हालांकि, अश्विनी चौबे ने यह भी दोहराया कि बिहार में सरकार हमारी बनेगी और नीतीश कुमार सीएम बनेंगे।

लेकिन उनके इस बयान के बाद राजनीतिक अटकलबाजियों का दौर शुरु हो गया है। इस बयान का सीधा मतलब ये निकाला जा रहा है कि शायद एनडीए में सब कुछ ठीक नहीं है और बिहार बीजेपी के शीर्ष नेता भी नहीं चाहते कि नीतीश कुमार को जोड़-तोड़ की मदद से सीएम बनाया जाए। विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी में इस तरह की राय बन रही है कि अगर पार्टी ज्यादा सीटें लेकर आती है, और अन्य सहयोगी दलों की मदद से सरकार बनाने की स्थिति बनती है, तो नीतीश के बजाए किसी बीजेपी नेता को सीएम पद पर बिठाया जाए।

क्यों तेवर बदल रही है बीजेपी?

एग्जिट पोल के आंकड़ों पर विश्वास करें, तो बिहार में जेडीयू की सीटें कांग्रेस से भी कम हो सकती हैं। कांग्रेस के जहां 30-35 सीटें जीतने का अनुमान लगाया जा रहा है, वहीं जेडीयू को 25 के आसपास सीटें मिलने की संभावना है। जाहिर है ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए जेडीयू का साथ फायदेमंद नहीं रहेगा। इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही है कि अगर बीजेपी जोड़-तोड़ से सरकार बनाने की स्थिति में हुई तो जेडीयू के नाराज विधायकों, और कांग्रेस समेत बाकी पार्टियों के विधायकों को तोड़ कर सरकार बनाने की कोशिश करेगी।

कांग्रेस तो इसकी आशंका से इतनी डरी हुई है, कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अभी से अपने महासचिव रणदीप सुरेजवाला और अविनाश पांडेय को बिहार का ऑब्जर्वर नियुक्त कर दिया है। ये दोनों बिहार चुनाव परिणाम के निकलने के पहले और बाद की तमाम गतिविधियों की जानकारी केंद्रीय नेतृत्व को देंगे। लेकिन इनकी सबसे खास जिम्मेदारी ये होगी कि बिहार में मध्यप्रदेश पार्ट-2 जैसा कुछ होने नहीं दिया जाए।

बीजेपी को नीतीश से क्या है परेशानी?

ये तो साफ है कि चुनाव प्रचार के दौरान एलजेपी को लेकर दोनों दलों में मतभेद रहे, और एक-दूसरे से शिकायतें बनीं रहीं। कुछ मामलों में दोनों दलों के नेताओं ने एक-दूसरे पर धोखाधड़ी तक के आरोप भी लगाये। इसके अलावा मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश की कार्यशैली से भी बीजेपी के कई विधायकों में नाराजगी है। नीतीश ने विधायकों का स्थानीय क्षेत्र विकास फंड समाप्त कर दिया और तमाम योजनाएं उनके या मुख्यमंत्री के नाम से शुरु हुईं। जैसे – मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना, मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, मुख्यमंत्री रोजगार ऋण योजना…वगैरह वगैरह। वैसे सीएम का तर्क ये था कि विधायक फंड के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है, लेकिन इसकी वजह से विधायकों को अपने क्षेत्र में ना नाम कमाने का मौका मिला..ना काम का। जाहिर है, ये विधायक नहीं चाहते कि दुबारा ऐसी स्थिति आये, जिसमें ना कमाई हो…ना काम।

वरिष्ठ नेताओं में भी नाराजगी

बिहार के कई वरिष्ठ नेता नीतीश कुमार से नाराज हैं। वैसे, भी अश्विनी चौबे के इस बयान को कहीं न कहीं नीतीश कुमार के उस दांव से भी जोड़कर देखा जा रहा है जो उन्होंने 2014 लोकसभा चुनाव में अपनाया था। उस समय नरेंद्र मोदी को एनडीए की ओर से पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने के दौरान नीतीश कुमार ने इसका विरोध किया था। इस दौरान अश्विनी चौबे, गिरिराज सिंह और रामेश्वर चौरसिया ने खुले तौर पर पीएम मोदी का समर्थन किया था। नीतीश की धर्म-निरपेक्ष दिखनेवाली कोशिशों को भी मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रयास माना जाता रहा है।

दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने साल 2019 से ही नीतीश कुमार और जेडीयू के खिलाफ बोलना शुरु कर दिया था। वैसे, बीजेपी आलाकमान के निर्देश के बाद उनके सुर नरम पड़ गये। वहीं, बीजेपी के पूर्व नेता और नोखा से एलजेपी प्रत्याशी रामेश्वर चौरसिया ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि नीतीश कुमार प्लानिंग के तहत बीजेपी की मजबूत सीटों पर दावा ठोंकते हैं, और इससे बीजेपी के कोर वोटों में बिखराव होता है।

अब तेरा क्या होगा नीतीश?

71 साल के नीतीश कुमार के लिए आगे की हार आसान नहीं है। अगर चुनाव हार गये, तो इस उम्र में विपक्ष में बैठने का कोई फायदा नहीं। अगली बार चुनाव जीत भी गये, तो मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं होगा। वहीं अगर बीजेपी के साथ सौदेबाजी में मोदी सरकार में कोई मंत्री पद मिल जाए, तो रिटायरमेंट का जुगाड़ हो जाएगा। शायद बीजेपी के नेता नीतीश कुमार को इसी तरह के हिंट दे रहे हैं, ताकि पहले से माहौल बनाया जा सके।

वैसे, ये सब इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव परिणामों में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हैं…? और, इस बात पर भी कि राजनीति के घुटे हुए खिलाड़ी नीतीश कुमार अपने लिए क्या प्लान बनाते हैं…? वैसे भी इस मामले में नीतीश को कम करके आंकने की गलती कोई नहीं करना चाहेगा।

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