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किसने बिगाड़ा ‘सचिन’ का खेल?

राजनीति संपादकीय

किसने बिगाड़ा ‘सचिन’ का खेल?

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who spoiled the game of sachin?

राजनीति में सचिन पायलट कच्चे खिलाड़ी साबित हुए और अशोक गहलोत पक्के…। अब सचिन ऐसी जगह पर खड़े हैं, जहां से ना तो आगे जाया जा सकता है और ना पीछे। आखिर सचिन से इतनी बड़ी चूक कैसे हुई?…किसने उनका खेल बिगाड़ा?

किसने बिगाड़ा खेल?

  • राजनीतिक हलकों में जो चर्चा है…उसके मुताबिक बीजेपी की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ही सचिन पायलट के प्लान पर पानी फेर दिया।
  • सूत्रों के मुताबिक, वसुंधरा राजे नहीं चाहती थीं कि राजस्थान में बीजेपी की ओर से कोई और मुख्यमंत्री पद का दावेदार बने। अगर सचिन पायलट मुख्यमंत्री बन जाते, तो उनका राजनीतिक करियर ही दांव पर लग जाता।
  • बीजेपी के सहयोगी नेता और नागौर सांसद हुनमान बेनीवाल ने साफ आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ही अशोक गहलोत की सरकार की डूबती नैया को बचाने में जुटी हैं।
  • राजस्थान में अभी भी वसुंधरा राजे का रसूख है और अपने मैदान में किसी और खिलाड़ी को उभरने का मौका नहीं दे सकतीं।
  • ज्योतिरादित्य सिंधिया के मित्र सचिन पायलट….गहलोत-वसुंधरा समीकरण को समझ नहीं पाए और गलती कर बैठे।

ज्यादा आत्मविश्वास ले डूबा?

  • सचिन पायलट को उम्मीद थी कि 25-30 विधायकों के साथ आने से राजनीतिक हवा बदलेगी…और सत्ता के लालच में गहलोत से असंतुष्ट कई अन्य विधायक भी उनके साथ आ जाएंगे।
  • लेकिन अशोक गहलोत इस मामले में ज्यादा शातिर निकले और बड़ी सूझ-बूझ से बाकी विधायकों को..सचिन के साथ जाने से रोक लिया।
  • अशोक गहलोत इतने सक्षम साबित हुए कि सचिन के करीबी पांच विधायक भी उनका साथ छोड़कर वापस गहलोत के खेमे में चले गये। ये सभी वो लोग थे, जिन्हें पायलट के कारण ही टिकट मिला और मंत्री बनाया गया।
  • संख्या बल जुटाने में जितनी देर हुई…विधायकों के सचिन के समर्थन आने की संभावना उतनी ही कम होती गई।

बीजेपी में क्यों नहीं गये सचिन?

  • सचिन पायलट को उम्मीद थी कि अगर गहलोत की सरकार गिर गई, तो बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। लेकिन जब सरकार बनाने की स्थिति ना हो, तो बीजेपी में जाने का क्या लाभ?
  • भाजपा में पहले से ही पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल, प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया और राज्यवर्धन सिंह जैसे कई नेता सीएम पद के दावेदार हैं।
  • इस तरह, मौजूदा हालात में भाजपा में शामिल होने से…उन्हें भविष्य में भी कोई खास लाभ होता नजर नहीं आ रहा है।
  • पायलट के समर्थक विधायकों में कई ऐसे हैं, जो बीजेपी में जाना नहीं चाहते। स्थानीय राजनीति में वे हमेशा के बीजेपी के खिलाफ रहे, और अब अगर वो उसी पार्टी में गये, तो जनता को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।

कांग्रेस क्यों नहीं छोड़ना चाहते सचिन?

  • अगर वे कांग्रेस छोड़ते हैं तो दलबदल कानून के तहत उनकी विधानसभा की सदस्यता चली जाएगी। अगर सत्ता नहीं मिली, तो ये घाटे का सौदा होगा।
  • पायलट समर्थक 19 विधायकों में से ज्यादातर दुबारा चुनाव नहीं लड़ना चाहते। इनमें से भी कुछ ऐसे हैं जो मानते हैं कि ये कार्यकाल अंतिम ही है।
  • पायलट के पास पूरे प्रदेश में वोट बैंक नहीं है। वे गुर्जर समाज के तो नेता हैं, लेकिन इसका प्रभाव प्रदेश की मात्र 30 सीटों पर ही है। इसलिए सचिन अलग पार्टी बनाने का जोखिम नहीं उठा सकते। 

अब क्या है स्थिति?

  • तीन दिन पहले तक 30 विधायकों का समर्थन होने का दावा करने वाले पायलट के पास अब सिर्फ 25 विधायक शेष हैं।
  • राजनीतिक जोड़तोड़ में माहिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सचिन पायलट को सूबे की राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
  • सचिन पायलट कांग्रेस को छोड़ना नहीं चाहते हैं लेकिन अब उनकी घर वापसी के सारे रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। 
  • सचिन पायलट और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई कर कांग्रेस ने साफ संदेश दिया है कि अगर कोई पार्टी लाइन से बाहर जाता है तो उसके प्रति नरमी नहीं बरती जाएगी, चाहे वो कितना भी बड़ा नेता क्यों ना हो।
  • अपने सख्त कदम के जरिए कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा, दीपेंद्र हुडा, अदिति सिंह, संजय निरुपम जैसे लोगों को भी कड़ा संदेश दिया है।

फिलहाल सचिन पायलट अदालत के जरिए अपना निलंबन टालने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से उनकी बातचीत भी चल रही है। हो सकता है… उन्हें राजस्थान की राजनीति से निकाल कर… केन्द्रीय राजनीति में कोई पद या जिम्मेदारी सौंप दी जाए। अगर कांग्रेस में बात नहीं बनी, तो वो देर-सबेर बीजेपी में भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन एक बात तो तय है, सचिन चाहे कांग्रेस में रहें या बीजेपी में….उन्हें पहले वाली पोजिशन नहीं मिलेगी। उन्हें अब दूसरे दर्जे के नेता के तौर पर ही संतोष करना पड़ेगा।

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