Type to search

जान बचाई…कोरोना माई??!!

कोरोना संपादकीय

जान बचाई…कोरोना माई??!!

Share
women worshiping korona as goddess in bihar-jharkhand

“You can’t convince a believer of anything; for their belief is not based on evidence, it’s based on a deep seated need to believe.”

– Carl Sagan, Astronomer & planetary scientist

कोरोना के खिलाफ जंग में सभी चमत्कार की उम्मीद कर रहे हैं। जहां एक ओर पढ़ा-लिखा वर्ग, मेडिकल साइन्स से इसका इलाज ढूंढ निकालने की आस लिए बैठा है, तो वहीं दूसरी ओर बिहार-झारखंड की ग्रामीण महिलाएं पूजा-अर्चना के जरिए इससे बचाव की उम्मीद लगा रही हैं। बिहार के बरौनी क्षेत्र में ‘कोरोना माई’ की पूजा का एक वीडियो सामने आया और जल्द ही सोशल साइट्स पर वायरल हो गया। अविश्वसनीय कहानियों के बीच ये ना सिर्फ तेजी से फैला, बल्कि कई क्षेत्रों में इसे सच मानकर पूजा भी होने लगी। झारखंड के रांची, पलामू, गढ़वा, डालटनगंज सहित कई जगहों से ‘कोरोना माई’ की पूजा-अर्चना की खबर आ रही है।

क्या ये अंधविश्वास है?

ज्यादातर अखबारों ने इसे अंधविश्वास और अंधभक्ति करार दिया है। लेकिन सवाल ये है कि हमारे देश में अंधविश्वास कब नहीं था? क्या हमारे देश में हमेशा से प्राकृतिक शक्तियों की पूजा नहीं होती रही है? क्या वैदिक काल में जिस इंद्र, वरुण या अग्नि की पूजा होती थी, वो लोगों के भय के प्रतीक नहीं थे? यूनानी सभ्यता के देवता भी क्या तरह इसी शक्ति और भय के प्रतीक नहीं थे? जिससे हमें डर लगा, वो सभी आज पूजे जाते हैं। चाहे वो बारिश और वज्रपात के देवता इंद्र हों, या सब कुछ जलानेवाले देव अग्नि। पवन की गति को नियंत्रित करनेवाले वायुदेव हों या भीषण गर्मी से राहत देनेवाले सूर्यदेव, जंगलों में प्राण बचानेवाले नागदेव हों या अँधेरे में भूत-प्रेतों से रक्षा करनेवाले वानरराज। हम पूजा के मामले में पेड़-पौधों, जंगल-जानवर, जड़-चेतन आदि का भेद नहीं रखते। जिस पर आस्था बनी, उसी की पूजा शुरु कर दी।

बात सिर्फ वैदिक देवी-देवताओं की नहीं है। मनुष्यों को भी भगवान बनाने में हम पीछे नहीं रहे। अयोध्या के राजा राम, द्वारका के शासक कृष्ण हमारे आराध्य हैं। खास बात ये है कि इन्होंने कभी कोई चमत्कार नहीं दिखाया, मानव रुप में ही लोगों को उनका कर्तव्य बताया, आदर्श बताए और आम इंसानों की तरह ही मृत्यु को प्राप्त हुए। बुद्ध ने कभी नहीं कहा कि वो अवतार हैं, ना महावीर ने ईश्वरीय महिमा दिखाई। इन्होंने सिर्फ धर्म का रास्ता, या सही आचरण का रास्ता दिखाया, लेकिन इनके भी मंदिर बन गये, कथाएं बन गईं और पूजा शुरु हो गई। यही हाल साईबाबा और कुछ अन्य सूफी संतों का हुआ। दुनिया की दूसरी प्राचीन संस्कृतियों में भी ऐसा ही है, लेकिन वहां आधुनिकता ने परंपरागत देवी-देवताओं का अस्तित्व लगभग खत्म कर दिया।

कोरोना ‘माई’ की पूजा करती महिलाएं

हमारे देश में आधुनिक काल में भी ये सिलसिला रुका नहीं। यहां तक कि एक काल्पनिक कथा पर बनी फिल्म ने भी संतोषी माता जैसी देवी को जन्म दे दिया। 1975 में बनी ये फिल्म इतनी कामयाब हुई कि कमाई के मामले में, इसने इस साल रिलीज हुई फिल्म ‘शोले‘ और ‘दीवार‘ का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया। इस फिल्म ने उस जमाने में 5 करोड़ की कमाई की थी। इसके बाद तो देश में संतोषी माता के मंदिरों और भक्तों की बाढ़-सी आ गई। लोगों की इस अंधभक्ति को तोड़ने के लिए खुद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती को मीडिया में बयान देना पड़ा कि हमारे शास्त्रों में संतोषी माता का कहीं कोई जिक्र नहीं है। इसके कई सालों के बाद जाकर संतोषी माता का चलन बंद हुआ। दक्षिण भारत में तो रजनीकांत, कमल हासन, जयललिता जैसे फिल्मी कलाकारों के मंदिर बने हैं, जहां उनकी विधिवत पूजा होती है। क्या हम उन्हें अंधविश्वासी कर सकते हैं?

सवाल ये है कि जब हम सब, किसी ना किसी तरह की आस्था से जुड़े हैं, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, तो इन ग्रामीण-अशिक्षित महिलाओं को अंधविश्वासी कैसे कह सकते हैं?

“Men create gods after their own image, not only with regard to their form, but with regard to their mode of life.”

– Aristotle

तो क्या ये अंधविश्वास नहीं है?

चूंकि ये मुद्दा हिन्दू धर्म की स्त्रियों से जुड़ा है, उन्हें मूर्ख और अंधविश्वासी करार देने की होड़ लगी है, इसलिए चर्चा इसी परिप्रेक्ष्य में की जाए, तो बेहतर होगा। हमारे शास्त्रों, वेद-पुराणों और संहिताओं में एक बात बिल्कुल साफ तौर पर कही गई है – “भगवान साकार भी हैं और निराकार भी। उनका रुप-रंग महत्वपूर्ण नहीं है, आपकी आस्था महत्वपूर्ण है।” यानी मानो तो देव, नहीं तो पत्थर। उदाहरण के लिए, तुलसीदास के राम धनुर्धारी हैं, तो कबीर के राम ब्रह्म-स्वरुप। सूरदास के कृष्ण बाल-गोपाल हैं, तो जायसी के कृष्ण अद्वैत, निराकार। हम मानते हैं कि कण-कण में राम हैं, जन-जन में कृष्ण। इसलिए पीपल के पेड़ में जल चढ़ाते हैं, हाथी-वानर दिख जाएं तो शीश नवाते हैं, कहीं भी लाल रंग से पुता पत्थर दिख जाए, तो प्रणाम कर लेते हैं। इसलिए हिन्दू धर्म में वैदिक देवी-देवता हैं, तो ऐतिहासिक अवतार पुरुष भी; कबीलाई देव-देवियां (शिव, काली) हैं तो स्थानीय कुलदेवता और ब्रह्म-बाबा भी। सभी को समायोजित करने की इस क्षमता ने ही इस धर्म में 33 करोड़ (तथाकथित) देवी-देवताओं की गुंजाइश बनाई है।

“Whatever we cannot understand easily we call God; this saves wear and tear on the brain tissues.”

-Edward Abbey

तो क्या कोरोना को भी देवी मान लें?

हिन्दू धर्म में देवी-देवता पर नहीं, आस्था पर जोर दिया गया है। मुसीबत के समय में यही आस्था हमें शक्ति देती है, इससे लड़ने का हौसला देती है। धर्म का मकसद भी यही है और इसकी ताकत भी। तो अगर आपको वैज्ञानिकों के शोध की जानकारी से ताकत मिलती है, उस तरह की खबरें पढ़ने से हिम्मत मिलती है, तो आप ऐसा ही करिये। लेकिन जिन गरीब-अशिक्षित महिलाओं को कोरोना माई की पूजा से शक्ति मिलती है, इस बीमारी से जूझने की हिम्मत मिलती है, तो उन्हें ऐसा ही करने दें। इसे खबर बनाने की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि अपने अंदर झांक कर देखें, तो हम सब किसी ना किसी रुप में अंधविश्वासी हैं। वैसे भी आस्था में तर्क की गुंजाइश नहीं होती, और भक्ति हमेशा अंधी ही होती है।

बस ये ध्यान रहे कि ये कर्मकांड व्यक्ति-विशेष तक ही सीमित रहें, इससे किसी को नुकसान ना पहुंचे। पूजा-पाठ की होड़ में कोई अपना या किसी और का नुकसान ना करे। क्योंकि कुछ खबरें ऐसी भी आई हैं, जिसमें कोरोना से बचाव से लिए इंसानों की बलि चढ़ा दी गई है। अगर ऐसा होता है ये अंधविश्वास भी है, खबर भी और अपराध भी।

Prayer does not change God, but it changes him who prays.


— Soren Kierkegaard, philosopher

Share This :
FacebookTwitterWhatsAppTelegramShare
Tags:

You Might also Like

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *